ज़िन्दगी एकदम से थम सी गयी थी
हर अहसास कई गुना बढ़ सा गया था
ज़बान पर एक अजीब सी मिठास सी थी
मन जाने किन ख़यालों मे रम सा गया था
बेइंतहा ख़ुशी थी मगर एक सवाल सा था
वो तुम थीं या कोई ख़याल सा था?
तुम्हें देखते ही ज़माना ग़ैर ज़रूरी सा हो गया था
तुम्हारी आवाज़ हर आवाज़ को ख़ामोश कर देता थी
हर बेचैनी तुमसे टकराकर बेफ़िक्री में तब्दील हो जाती थी
मगर, तुम मेरी नहीं थी, इस बात का मलाल सा था
वो तुम थीं या कोई ख़याल सा था?
आज भी वो एहसास बेवक्त दस्तक दे जाता है
आज भी मैं तुम्हें भीड़ में ढूँढने लगता हूँ
आज भी याद आता है वो दर्द, जो बेमिसाल सा था
वो तुम थीं या कोई ख़याल सा था?
– दीप
